चारा फसल मृदा इसकी खेती दोमट या बलुई और हल्की काली मृदा में की जाती है। भूमि का जल निकास अच्छा होना चाहिए। एक जुताई मृदा पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताइयां देसी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए। प्रजातियां हरे चारे के लिए संकर या कम्पोजिट बाजरा तथा जाइंट बाजरा, राज 171, एल.-72 एवं एल.-74 आदि प्रमुख प्रजातियां हैं। 8-10 कि.ग्रा./हैक्टर बीज शुद्ध फसल की बुआई के लिए पर्याप्त होता है। बीज उपचार मिलवां फसल में बाजरा तथा लोबिया 2:1 अनुपात में बुआई के लिए 6-7 कि.ग्रा. बाजरा तथा 12-15 कि.ग्रा. लोबिया बीज की आवश्यकता होती है। 2.5 ग्राम थीरम/कि.ग्रा. बीज की दर से बीज उपचारित करें। उर्वरक बाजरा के लिए 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टर की आवश्यकता होती है। ज्वार की प्रजातियां ज्वार की प्रमुख प्रजातियां जैसे-पूसा चरी-23, पूसा हाइब्रिड चरी-109, पूसा चरी-615, पूसा चरी -6, पूसा चरी-9, पूसा शंकर-6, एस.एस.जी. 59-3 (मीठी सूडान), एम.पी. चरी, एस.एसजी.-988-898, एस.एस.जी.-59-3, जे.सी. 69, सी.एस.एच.-20-एम.जी., हरियाणा ज्वार-513, आदि हैं, जो इस समय लगायी जा सकती हैं। ज्वार की इन किस्मों से 30-60 टन/हैक्टर तक हरे चारे की प्राप्ति होती है। बहु-कटाई वाली किस्में जैसे मीठी सूडान, एम.पी. चरी, पूसा चरी 23, जवाहर चरी 69 से 60 टन/हैक्टर तक हरे चारे की पैदावार ली जा सकती है। मक्का की प्रजातियां मक्का की हरे चारे के लिए अफ्रीकन टॉल, विजय कम्पोजिट, जे-1006, प्रताप चारा-6 तथा संकर मक्का गंगा-2, गंगा-7 प्रमुख उन्नत प्रजातियां हैं। जहां तक हो सके, किसानों को मक्का एवं ज्वार की मिश्रित फसल लोबिया और ग्वार के साथ उगानी चाहिए। इससे चारे की पौष्टिकता एवं स्वादिष्टता बढ़ती है तथा मृदा की उर्वरा शक्ति में भी सुधार होता है। 50-60 कि.ग्रा./हैक्टर बीज शुद्ध फसल की बुआई के लिए पर्याप्त होता है। बीज एवं बीज उपचार मक्का या जवार के साथ मिलाकर बुआई के लिए 15-20 कि.ग्रा. बीज प्रयोग करना चाहिए। 2.5 ग्राम थीरम/कि.ग्रा. बीज की दर से बीज उपचारित करें। उर्वरक संकर तथा संकुल किस्मों में 120 कि.ग्रा. तथा देसी प्रजातियों में 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 60 कि.ग्रा. फॉस्फारेस, 60 कि.ग्रा. पोटाश/ हैक्टर की आवश्यकता होती है। दीमक की समस्या दीमक की समस्या ज्यादा हो, वहां अंतिम जुताई पर क्योनोलफॉस (1.5 प्रतिशत) की 25 कि.ग्रा. मात्रा का प्रति हैक्टर प्रयोग करना चाहिए। बरसीम बरसीम में 10-12 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई एवं कटाई करते रहें। यदि बरसीम की फसल बीज उत्पादन के लिए उगाई गयी है तो मार्च के बाद कटाई नहीं करनी चाहिए। फूल आ जाने पर बीज वाली फसल में सिंचाई नहीं करनी चाहिए। यानी अप्रैल के प्रथम सप्ताह के बाद सिंचाई बंद कर देनी चाहिए। 10-15 मई तक फसल पककर तैयार हो जाती है। ग्रीष्मकाल में पशुओं के लिए चारे की कमी अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में एक आम समस्या है। इसके समाधान के लिए गर्मी के मौसम में अप्रैल में जहां सिंचाई की व्यवस्था है, वहां पर हरे चारे की खेती कर सकते हैं। इस समय प्रमुख हरे चारे में मक्का, लोबिया, ज्वार आदि फसलों की उत्तम किस्मों को सुझाई गयी सस्य क्रियाओं को अपनाकर उगाना चाहिए। चारे वाली लोबिया किस्में चारे के लिए लोबिया की प्रमुख प्रजातियां जैसे-बुन्देल लोबिया, सी.-20, सी.-30-558, सी.ओ.-5, ई.सी.-4216, रशियन जायन्ट, एच.एपफ.सी. 42-1, यू.पी.सी.-5286, यू.पी.सी.-5287, यू.पीसी.-287, एन.पी.-3, हैं। अच्छी प्रकार खेत तैयार कर इसकी बुआई 40 कि.ग्रा. बीज/हैक्टर की दर से करते हैं। बुआई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25-30 सें.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 15 सें.मी. रखनी चाहिए। लोबिया की कटाई, बुआई के 50-55 दिनों बाद करते हैं। स्त्रोत : खेती पत्रिका(भाकृअनुप) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001, विनोद कुमार सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोष नगर, हैदराबाद।